दद्दा के फैन थे हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरुद्दीन

दद्दा के फैन थे हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरुद्दीन

उत्तर प्रदेश। ग़ाज़ीपुर के मशहूर हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरुद्दीन खान का जन्म 2 जुलाई 1933 ई० को उत्तर प्रदेश के जिला ग़ाज़ीपुर में ‘कमसार-व-बार’ क्षेत्र के मौजा गोड़सरा गांव स्थित एक ज़मीदर परीवार में ‘अहाता’ नामक स्थान पर मोलवी मुंसी नबी बख्श खां के घर हुआ था। इनके पिता का नाम मोलवी मु० मोहिउद्दीन उर्फ मोहा खां (तहसीलदार) तथा माता का नाम मरीयम बीबी जो एक घरेलू नेक खातून थी। बदरुद्दीन खां का जब जन्म हुआ उस दरम्यान देश में भारतीय अंतरराष्ट्रीय हॉकी विजेता समर ओलंपिक टीम (1928, 32, 36) का जश्न सुमार था और पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी गोल्ड मेडलिस्ट मेजर ध्यांचन्दर (दद्दा) के जय जयकार हो रहा था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

बदरुद्दीन जब धीरे-धीरे बड़े हुए तो उनका दाखिला प्राइमरी इस्लामिया कॉलेज से पूरी होने के बाद दिलदारनगर स्थित उनके पुश्तैनी कॉलेज गांधी मेमोरियल इण्टर कॉलेज में कक्षा- 6 में हुआ। जहां से वो कॉमर्स स्ट्रीम से मैट्रिक की पढ़ाई पूरा करने के बाद इंटरमीडिएट में दाखिला लिए।

बदरुद्दीन पढ़ने-लिखने में तेजों तरार थे, लेकिन खेल की वजह से वह दो मरतबे मैट्रीक में फेल हुए। बदरुद्दीन अधिकतर समय खेल में देते। हॉकी उनके रगों में सुमार थी, गेंद के पीछे वो नही उनके पीछे गेंद दौड़ा करता वो उनकी खेल की खूबसूरती थी। बदरुद्दीन चार मरतबा अपने जिले से 100 मीटर की रेस में चैंपियन रहे। एक मरतबे जोनल हॉकी खेल में डिस्ट्रीक्ट से जोन चैंपियन रहे। उनका एक सपना था कि मैं अपने जिले से भारतीय अंतरास्ट्रीय हॉकी टीम का नेतृत्व करे और मुझे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद्र (दद्दा) के साथ खेलने का सिर्फ एक मौका मिले लेकिन अफसोस! जिसका चश्मदीद गवाह उनके पैतृक गांव गोड़सरा के रहने वाले उनके साथी सहपाठी हॉकी खिलाड़ी हाजी सोहराब खां है। गौरतलब हो कि 20 जनवरी सन.1955 ई० की हॉकी खेल का वह ऐतिहासिक असहनीय क्षण जो लोगों के दिलों ज़ेहन मे आज भी ज़िन्दा है। जो कभी भूलने का नाम नहीं लेती।

‘जोनल हॉकी टूर्नामेन्ट’ का फाइनल मैच

कमसारोबार खित्ते के दिलदारनगर स्थित मुस्लिम राजपूत इन्टर कॉलेज (वर्तमान एस०के०बी०एम० इण्टर कॉलेज) का वह खेल मैदान जिसमें क्षेत्रीय लोगों का जन सैलाब खित्ते में दूसरी मरतबा हो रहे ‘जोनल हॉकी टूर्नामेन्ट’ का फाइनल मैच देखने के लिए उमड़ पड़ी थी। एक तरफ गाँधी मेमोरियल इण्टर कॉलेज (वर्तमान एस०के०बी०एम० में सन.1955 में एकिकृत कर दिया गया है

Hockey Player Shahid Badruddin Khan. file photo

दिलदारनगर की हॉकी टीम तो दूसरी तरफ ज़मानियाँ हिन्दू इण्टर कॉलेज की हॉकी टीम फाइनल मुकाबले के लिए ड्रेसप में कमर कस चुकी थी। मुकाबला काफी रोचक था। एक तरफ लोगों के दिलो ज़ेहन में ‘गाँधी मेमोरियल इण्टर कॉलेज’ दिलदारनगर के होनहार फारवर्ड हॉकी खिलाडी बदरुद्दीन का पिछला कारनामा घूम रहा था तो दूसरी तरफ विपक्षी टीम के खिलाड़ी भी अपने जीत का दावा ठोंक रहे थे। खेल अब शुरू होने ही वाला था तब तक वहां पहले से मौजूद कला मास्टर गुप्ता जी दिलदारनगरी ने दोनों टीमों की एक फोटो सूट की(जो अभी तक अपर्याप्त है)

यह मुकाबला दिन के (2:30) बजे से मुस्लिम राजपूत इण्टर कॉलेज, दिलदारनगर के ग्राउंड पर शुरू हुआ और फर्स्ट मीटिंग में दोनों टीमों के बीच कोई गोल नहीं हुई थी लेकिन सेकण्ड मीटिंग की शुरुआत होते ही जैसे ही बदरुद्दीन की हॉकी स्टीक से  गेंद टकराती है और वो गेंद को घसीटते हुए जैसे मानो हवा के माफिक विरोधी टीम के गोलपोस्ट में  सीधे गेंद ले जाकर गोल कर देते हैं परंतु गोल कर जब वो वापस अपने गोल पोस्ट की तरफ लौट रहे होते हैं तो अचानक विरोधी टीम के बैक पर खड़ा खिलाडी धोखे से उनके सिर पर पीछे से हॉकी स्टीक द्वारा वार कर देता है जो खेल जगत को शर्मसार करता है।

जिससे बदरुद्दीन बेहोश होते ही मैदान में गिर पड़ते है। मैदान में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो जाता है तब तक विरोधी टीम के खिलाडी मौके का फायदा उठा वहाँ से खिसक पडते हैं। उसी बीच अचानक हॉकी खिलाड़ी साथी सेराजुद्दीन ‘गोलकीपर’ की नज़र बेहोश पड़े हूए बदरुद्दीन पर पड़ती है और वो जोर से चिल्ला उठते हैं उसके बाद फौरन उनको वहाँ से उठा कर दिलदारनगर के डॉ० श्याम नारायण चतुर्वेदी के पास ले जाया जाता है। उन्होंने एक इन्जेक्शन दी, जिससे इन्जेक्शन पड़ते ही बदरुद्दीन उठ कर बैठ जाते हैं और एक नज़र सबको देखने के बाद वापस बेहोश हो जाते हैं। फिर उन्हें कॉलेज टीम द्वारा रेलगाड़ी से ‘बी०एच०यू०’ बनारस किंग एडवर्ड हॉस्पिटल (वर्तमान शिव प्रसाद हॉस्पिटल) कबीर चौरा में ले जाया जाता है। जहां पर उनके बेहोशी की हालात में तीन दिन बाद  दुनिया-ए-फ़ानी से जावेदानी को कूच कर जाते हैं।

 ‘क़ालु इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेउन’ उन्हें जामे शहादत जो पीनी थी तो दवा क्या काम करती! उसके बाद उनके जस्दे ख़ाकी (शव) को मुगलसराय-जमानिया-मार्ग द्वारा सफ़ेद कार में फूल-मालाओं से लदा हुआ दिलदारनगर गाँव स्थित जामा मस्जिद के पास आ खड़ी हुई। वहां पहले से मौजूद बुजुर्गो और नौजवानों की एक बहुत बड़ी हुजूम उनकी एक झलक पाने के लिये बेसब्री से इंतजार कर रहे थे उन सभी ने उनके शव का आखिरी दीदार किया। उसके बाद उनके शव को वहां से मुस्लिम राजपूत इण्टर कॉलेज ग्राउंड पर लाई गई। जहाँ पर खेल हुई थी। उसके बाद कार द्वारा उस कॉलेज ग्राउंड का एक चक्कर लगा कर वहीं रुक गई, जिसके चश्मदीद गवाह मास्टर हाजी करीम रज़ा ख़ाँ साहब दिलदारनगरी हैं।

उसके बाद मुस्लिम राजपूत इंटर कॉलेज के संस्थापक डिप्टी सईद के कयादत में मैनेजर हाजी शमसुद्दीन खाँ व और बदरुद्दीन साहब के परीवार से ताल्लुक रखने वाले महमूद खाँ की सूझ-बुझ के कारण उनकी वालदह से इजाज़त लेकर उनके शव को उसी कॉलेज ग्राउंड में तकरीबन 8 बजे रात कोे नमाज़े जनाज़ा हाजी बसीर मियां ‘गोड़सरावी’ द्वारा पढ़ाई गई तथा ‘मिल्लिट्री गार्ड ऑफ़ ऑनर्स’ के साथ उसी कॉलेज ग्राउंड की रणभूमि मे हज़ारों की भीड़ की मौजूदगी में हाथों-हाथ दफ़न कर दिया जाता है। उनके याद में कॉलेज स्थित परीसर में बदरुद्दीन मेमोरियल लाईब्रेरी की बुनियाद 21 दिसंबर 1957 को पड़ी। साथ ही उनके मज़ार का निर्माण एवंम उनके पैतृक गाँव गोड़सरा स्थित “बदरुद्दीन मेमोरियल स्पोर्ट्स क्लब” की नींव रखी गई।

‘मजार-ए-मुबारक’ शहीद बदरुद्दीन खां

सामाजिक संस्था “बदरुद्दीन मेमोरियल फाउंडेशन”

सामाजिक संस्था “बदरुद्दीन मेमोरियल फाउंडेशन” गोड़सरा के प्रबंध निदेशक एवंम जोनल हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरुद्दीन खां के पोते समाजसेवी मु० शहाबुद्दीन उर्फ शहाब खान ‘गोड़सरावी’ ने उनके नाम पर क्षेत्रीय विधायक श्रीमती सुनीता सिंह से लखनऊ स्थित विशिष्ट विधायक गृह पर मुलाकात कर उनके पैतृक गांव गोड़सरा स्थित खेल मैदान पर 6 मार्च 2018 को अपने संस्था का पत्रक देकर “शहीद बदरुद्दीन मेमोरियल स्टेडियम” बनवाने की मांग किया जिसके लिए उन्होंने आश्वासन भी दी परंतु अब तक सरकार ने स्टेडियम के लिए कोई पहल नही किया! अब देखना हैं कि इस महान खिलाड़ी की स्मृतियों को जिन्दा रखने के लिए सरकार कब पहल करती हैं? ( लेखक : तौसीफ खां )

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