मुग़ल बादशाह बाबर की आख़री जंग

mugal baber last war in bihar chpara

आज ही के दिन 6 मई 1529 को बिहार छपरा में “घाघरा का युद्व” लड़ा गया। यह जंग मुग़ल बादशाह बाबर की आख़री जंग थी। ये जंग जितनी ज़मीन पर लड़ी गयी उतनी ही पानी पर, जंग के बाद घाघरा नदी खून से लाल हो गयी थी।

मुग़ल बादशाह बाबर

ये जंग बाबर और महमूद लोदी की गठबंधन सेना की बीच लड़ी गयी। इस जंग में बिहार के सुल्तान जलालुद्दीन लोहानी, बंगाल के सुल्तान नुसरत शाह और शेरशाह सूरी ने महमूद लोधी का साथ दिया था। तब शेरशाह सूरी लोहानी के कमांडर हुआ करते थे।

दिल्ली में अफ़ग़ानों का शासन खत्म हो चुका था महमूद लोधी ने बिहार में शरण ले रखी थी। 1528 में बाबर जब चंदेरी के जंग में मशगूल थे तो अफ़ग़ानों ने इसका फायदा उठाया और बाबर को बिहार और बंगाल से दूर रखने के लिए दिल्ली की तरफ कूच कर दिया।

शेरशाह सूरी अफ़ग़ान सेना को लीड करते हुए पहले चुनार के किले को किले फ़तह किया उसके बाद बनारस पर हमला कर क़ब्ज़ा कर लिया उस वक़्त बनारस जौनपुर के शरक़ी सल्तनत के अधीन था, इस तरह बनारस जौनपुर के शरकी सुलतान के हाथों से निकल गया।

दिल्ली की तरफ बढ़ते अफ़ग़ानों की खबर जब बाबर को मिली तो बाबर ने चंदेरी की जंग खत्म होते ही बिहार का रुख किया। लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस फ़तह करने के बाद गंगा पार करके अपना शाही डेरा डाला। बाबर को पता था बंगाल के नवाब नुसरत खान के बिना समर्थन के अफ़ग़ान इतना आगे नही बढ़ सकते इसलिए बाबर ने बंगाल के नवाब को पीछे हटने के लिए सन्देश भिजवाया लेकिन नुसरत खान नही माने।

अफ़ग़ान गठबंधन सेना ने सोचा था लगातार जंग की वजह से बाबर की सेना थक गयी होगी और जल्दी ही जंग हार जायेगीं लेकिन ऐसा नही हुआ। बाबर की सेना गठबंधन सेना के मुकाबले आधी थी फिर भी हर बार की तरह बाबर ने इस जंग में भी फ़तह हासिल की।

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