ऐन जालूत की जंग

ऐन जालूत की जंग:

ऐन जलुत की लड़ाई (अरबी: معركة عين الوت‎, रोमानीकृत: मारकत ‘ऐन जलत), जिसे ऐन जलुत भी कहा जाता है, मिस्र के बहरी मामलुक और मंगोल साम्राज्य के बीच 3 सितंबर 1260 (25 रमजान 658 एएच) को लड़ा गया था। दक्षिण-पूर्वी गलील में जेज़्रेल घाटी में जिसे आज हरोद के वसंत के रूप में जाना जाता है (अरबी: عين الوت‎, रोमानी: ‘ऐन जलीत, lit. ’गोलियत का वसंत’)। युद्ध ने मंगोल विजय की सीमा की ऊंचाई को चिह्नित किया, और पहली बार मंगोल अग्रिम को युद्ध के मैदान पर सीधे मुकाबले में स्थायी रूप से पीछे छोड़ दिया गया था।

जब 1251 में मोंगके खान महान खान बने, तो उन्होंने तुरंत अपने दादा चंगेज खान की विश्व साम्राज्य की योजना को लागू करने के लिए निर्धारित किया। पश्चिम में राष्ट्रों को वश में करने के कार्य का नेतृत्व करने के लिए, उन्होंने अपने भाई, चंगेज खान के पोते, हुलगु खान में से एक को चुना।

तातारियों की यलग़ार के ख़िलाफ़ ऐन जालूत का मार्का भी मुसलमानों के लिए एक इंतिहाई ज़बरदस्त कामयाबी पर ख़त्म हुआ। ये टकराव रमज़ान 658 हिजरी (1260 CE) में हुआ था। 656 हिजरी के आख़िर में तातारियों ने इस्लामी ख़िलाफ़त के ख़िलाफ़ एक ज़बरदस्त मुहिम शुरू की, जिसके नतीजे में दारुल खिलाफा बग़दाद पर तातारियों का क़ब्‍ज़ा हो गया, ख़लीफ़ा मुसतासिम बिल्‍लाह को क़त्‍ल कर दिया गया और इस्लामी रियासत के दो तिहाई हिस्से पर तातारियों का क़ब्‍ज़ा हो गया।

तातारियों ने इस्लामी ख़िलाफ़त के ख़िलाफ़ एक ज़बरदस्त मुहिम शुरू की

मुसलमानों के आख़िरी मज़बूत इलाक़ों, मिस्र और मराक़श की जानिब बढ़ते हुए तातारियों ने मिस्र के अमीर, महमूद सैफउद्दीन क़ुदज़ के नाम एक धमकी आमेज़ ख़त भेजा जिसमें कहा गया था कि: “हमने तुम्हारी ज़मीनों को तबाह, बच्चों को यतीम, लोगों को क़त्‍ल, औरतों की इज़्ज़तों को तारतार और उनके सरदारों को क़ैद कर लिया है। क्या तुम ये समझते हो कि तुम हम से बच सकोगे? कुछ ही अर्से में तुम जान जाओगे कि तुम्हारी जानिब क्‍या आ रहा है।।।।

” सैफउद्दीन क़ुदज़ ने एक सख़्त जवाब दिया। उसने तातारी प्रतिनिधी को क़त्‍ल कर दिया और उनकी लाशों को शहर में लटका दिया जिसके नतीजे में जहां एक तरफ़ उसकी फ़ौज और रिआया (प्रजा) की हिम्मत में इज़ाफ़ा हुआ तो दूसरी जानिब दुश्मन, उनके जासूस और उनके हमदर्द ख़ौफ़ज़दा हो गए। इस अमल ने जहां मुसलमानों में जोशोख़रोश पैदा कर दिया वहीं तातारियों को ये एहसास भी हुआ कि वो एक ऐसे सरबराह का सामना करने जा रहे हैं जिसका तजुर्बा उन्हें इससे पहले कभी नहीं हुआ है। क़ुद्ज़ ने मुसलमानों को जंग के लिए तैय्यार किया। उसकी क़ियादत (नेतृत्‍व) में मुसलमानों ने ईमान, इत्तिहाद और ज़रूरी साज़ो सामान के साथ दुश्मन का सामना करने की तैय्यारी की। क़ुद्ज़ ने आलिमों और हुक्‍मरानों की मदद तलब की कि वो इस्लाम की दिफ़ा (रक्षा) और इस्लामी सरज़मीनों की आज़ादी के लिए अपना किरदार अदा करें। फिर जुमा 25 रमज़ान 658 हिजरी को मुसलमानों ने ऐन जालूत के मुक़ाम पर अपने दुश्मन का सामना किया। क़ुद्ज़ ने मैदाने जंग में मुसलमानों का नेतृत्‍व (क़ियादत) किया।

जंग की शुरूआत में तातारियों को बरतरी हासिल हो गई। इस सूरते हाल को देखकर क़ुद्ज़ एक पहाड़ी पर चढ़ गए, अपना लोहे का ख़ौल सर से उतार फेंका और चिल्‍लाए ”वा इस्‍लाम वा इस्‍लाम” फौज को अल्लाह (سبحانه وتعالى) के दुश्मनों के सामने डटे रहने और उनसे जंग करते रहने की तरग़ीब दी। क़ुद्ज़ के सुर्ख़ चेहरे, उसकी तलवार की फर्तीयों और दुश्मनों से भिड़ता देख कर मुसलमानों में हिम्मत पैदा हुई और मुस्लिम फौज ने जंग का पलड़ा अपने हक़ में पलट दिया और उस वक़्त तक लड़ते रहे जब तक तातारी फ़ौज तितर बित्तर हो कर मैदाने जंग छोड़कर भाग नहीं गई। इस्लाम और मुसलमानों को फ़तेह नसीब हुई। तातारियों ने जब देखा कि मशरिक़ में उनकी ताक़त कमज़ोर पड़ रही है और मुसलमान दुबारा ताक़त पकड़ रहे हैं तो वो अपने आबाई (पैतृक) इलाक़ों की तरफ भाग गए जिसके नतीजे में क़ुद्ज़ के लिए शाम (मौजूदा शाम, फ़लस्तीन, लेबनान वग़ैरा) को आज़ाद करवाना आसान हो गया और एक हफ़्ते में इस मक़सद को हासिल कर लिया।

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